अहमियत दी तो खुद को कोहिनूर मानने लगे: मेरे ही तराशे हुए पत्थर आज मंदिर में भगवान बने बैठे हैं, जरा सी इज्जत क्या दे दी कि अपने आप को अफलातून मान बैठे। अहमियत दी तो खुद को कोहिनूर मानने लगे। दुख की बात तो यह है कि कांच के टूकड़े भी क्या बहम पालने लगे।
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आज का युग सतयुग है या कलयुग समझ से परे है लेकिन हर व्यक्ति अपने आप को अपनी औकात से ज्यादा समझ रहा है जबकि यह जीवन यथार्थ में पानी के बुलबुले के समान है अभी है अभी नहीं है समझ से परे है कि नीचा दिखाकर इंसान क्या हासिल करना चाहता है लेकिन भगवान हर व्यक्ति की इच्छा को पूरा करे क्यों न वह इच्छा समाज के विपरीत हो समाज में उस इच्छा का कोई स्थान न हो।
आज के युग में किसी को अहमियत देना सबसे बड़ा गुनाह है क्योंकि न गुरू का सम्मान है, न पिता का सम्मान है, न समाज का सम्मान है बस झूठी शान के लिए इंसान किसी हद तक भी गिर कर किसी को उजाड़ने का संकल्प लेता है लेकिन ऐसा करने वाले भूल जाते हैं कि जब खुद को लगती है तभी खुदा याद आता है इसलिए इंसान अगर किसी का भला नहीं कर सकता तो कम से कम उसे किसी का बुरा करने का अधिकार नहीं।
पुरानी दो लाइनें सुनी थी ‘‘मत सता गरीब को, गरीब रो देगा, सुना अगर उसके मालिक ने तो जड़ से खो देगा’’। हां, किसी को बर्बाद कर शोहरत हासिल होती हो, धन हासिल होता हो तो जरूरी ऐसे दाव खेलने चाहिए लेकिन ऐसे दाव खेलने वालों का न आज कोई समाज में स्थान होगा और न आने वाली तारीख में कोई स्थान होगा।
क्योंकि पुरानी कहावत है मुर्दा बोले कफन फाड़े। ऐसे व्यक्ति से हमेशा समाज को कुटुंब को सावधान होना चाहिए जो किसी को नीचा दिखाकर अपनी खुशी चाहता हो।