अब भ्रम में जीना त्याग दिया: मुक्कदर का सिकंदर फिल्म में अमिताभ बच्चन ने एक गीत गया ‘‘रोते हुए आते हैं सब, हंसता हुआ जो जाएगा, वो मुक्कदर का सिकंदर जाने मन कहलाएगा’’ इसी तरह कबीर जी ने बहुत सुंदर दोहा लिखा ‘‘कबीरा जब हम आए जगत में, हम रोए जग हंसे, ऐसी करनी कर चले हम हंसे, जग रोए’’ पिछले तकरीबन 50 दिन से बहुत कुछ लिखा डायरी लिखने की आदत नहीं थी वह भी लिखी, आधी आधी रात तक लिखी अपना गुनाह दूसरे का गुनाह सब चिंतन किया अपना गुनाह क्या था, क्या मैंने खोया, क्या मैंने पाया, कौन मेरा था, किसको अपना समझ रहा था जिसको मैं अपना समझ रहा था वह तो ऐसे साफ हुआ जैसे गधे के सिर से सींग।
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लेकिन इन दो महीनों में बहुत से भ्रम दूर हो गए और अब भ्रम में जीना त्याग दिया है जितने दिन जीएंगे डंके की चोट पर जीएंगे किसी के सहारे नहीं जीएंगे किसी स्वार्थ में नहीं जीएंगे।
मुझे अब दुश्मनों का भय कम और अब ऐसा लगता है कि जिन लोगों को चलना सीखाया वही अब समय से पहले मेरा अंत चाहते हैं लेकिन उनके हाथ में नहीं है यह ताकत भगवान ने अपने हाथ में रखी इसलिए कहा गया यश, अपयश, हानि लाभ जीवन मरण सब विधि हाथ।
हमारे हाथ में कुछ नहीं है कुछ लोग हमें नीचा दिखाने का दावा कर रहे हैं कुछ लोग हमें जलील करना चाहते हैं कुछ लोग हमें समाज में बदनाम करने से डरा रहे हैं लेकिन वह देर कर रहे हैं
जो जिसके पास उन्हें मारने के लिए तीर है, हथियार है वो इस्तेमाल करना चाहिए। हां हमलावर को जवाब कैसे देना है वो समय तय करेगा क्योंकि मैं समय नहीं हूं, मेरी औकात नहीं समय बनने की जो लोग तीन में न तेरह में वो भगवान बनने का प्रयास कर रहे हैं जिनके लिए अपना जीवन लगा दिया।