बड़ा आसान है कहना समय हर घाव को भर देता है

बड़ा आसान है कहना समय हर घाव को भर देता है: कहते हैं time is big healer अर्थात समय हर घाव को भर देता है लेकिन यह कहना बड़ा आसान है चोट का घाव तो शायद समय के मुताबिक भर जाए ठीक हो जाए लेकिन शब्दों के घाव शायद तभी भर सकते हैं जब इंसान अपने सांस त्याग दे

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इससे पहले यह कहना गलत है कि समय हर घाव को भर देता है और सबसे अहम बात यह है कि शब्दों के बाणों का इस्तेमाल कौन कर रहा है? शब्दों के घाव कौन दे रहा है अगर बुजुर्ग माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी गुस्से में कोई अपशब्द कह दें

या किसी के सामने अपनों को डांट दें, पिटाई कर दें तो वह घाव भर सकते हैं इस आशा पर कि हमें अपशब्द कहने वाला, डांटने वाला हमारे माता पिता हैं, दादा दादी हैं नाना नानी हैं।

स्वाभिमानी व्यक्ति तो शायद इन रिश्तों से भी ऐसी उम्मीद नहीं कर सकता लेकिन अगर घाव देने वाले वो लोग हैं जिनको ऊंगली पकड़कर चलना सीखाया हो तो उनके दिए घाव को समय कैसे भर सकता है? शब्द सुनने में बड़े आसान लगते हैं ठीक वैसे जैसे किसी के दुख में दिलासा देने पहुंचता है लेकिन उस दुख की गहराई का पता तो उसी को होता है

जो उस दुख से जूझ रहा होता है इसलिए समय स्वाभिमानी व्यक्ति के घाव को नहीं भर सकता। वह तो उस व्यक्ति के साथ लकड़ियों में ही जाकर खत्म होते हैं।

आज माता पिता किसके लिए कमाए क्योंकि आज बच्चों के लिए मां बाप का कोई सम्मान नहीं रहा सिर्फ किताबों में यह बात लिखी है पहला गुरू मां, दूसरा गुरू पिता, तीसरा गुरू शिक्षक, चौथा गुरू भगवान लेकिन आज तो पहले और दूसरे गुरू को ही औलाद गाली गलौच करने से पीछे नहीं हटती अब तो मां बाप पर हाथ उठाने के संस्कार भी बच्चों ने सीख लिए हैं यह संस्कार बच्चों को पांचवा उनका कौन सा गुरू दे रहा है समझ से परे हैं।