पत्थर भी चोट के बिना भगवान की मूर्ति का रूप नहीं ले सकता: बहुत सुंदर पंक्यिां हैं ‘‘जिंदगी जीना आसान नहीं होता, बिना संघर्ष कोई महान नहीं होता, जब तक न पड़े हथौड़े की चोट, पत्थर भी भगवान नहीं होता’’ वैसे भी कक्षा पांच में बच्चों को पढ़ाया जाता था कि जो पत्थर छैनी और हथौड़ी की चोट से घबरा जाए वो मूर्ति नहीं बन सकता और पत्थर तभी भगवान की मूर्ति का रूप लेता है जब वह चोट खाता है और चोट खाकर जब पत्थर को तराशा जाता है
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और मूर्ति का रूप दिया जाता है तब वही पत्थर मूर्ति का रूप बनकर पूजा जाता है इसलिए पत्थर को भी तराशने वाला चाहिए और जो तराशने वाला होता है वह बिना छेनी और हथौड़ी की चोट के वह तराश नहीं सकता और जो उस हथौड़ी की चोट सह गया उसकी पूजा होने से कोई नहीं रोक सकता। इसलिए तराशने वाले का अगर आप सम्मान नहीं कर सकते
तो उसका अपमान करने का कोई अधिकार नहीं अगर आप किसी का धन्यवाद नहीं कर सकते तो आपको उसको जलील करने का भी अधिकार नहीं क्योंकि इस दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो भगवान बनने का प्रयास करे या जिसने कोई गलती न की हो।
बहुत प्यारा गीत है ‘‘यार हमारी बात सुनो, ऐसा एक इंसान चुनो, जिसने पाप न किया हो उसे पापी कहो’’ आज जिनके दूध के दांत नहीं टूटते वो डराने का प्रयास करते हैं टूटकर गिरते हैं, अपमान करते हैं, गाली देते हैं वैसे तो जिसके जैसे संस्कार होंगे वैसी बात करेगा अर्थात पुरानी कहावत है बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होगा। अर्थात जिसकी जैसी संगत होगी, जिसकी जैसी सोच होगी वैसी बात करेगा।
हमने तो सीख लिया है कि अगर अच्छा नहीं बोल पा रहे हो तो बुरा बोलना बंद कर दो क्योंकि गंद से खुशबू नहीं आया करती और नीच आदमी से अच्छी सोच की उम्मीद नहीं की जा सकती।